गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक आज भी क्यों मानते हैं लालू यादव को अपना नेता।

लालू यादव (फाइल फोटो, COURTESY: BUSINESS STANDARD)

लालू यादव (फाइल फोटो, COURTESY: BUSINESS STANDARD)

–शम्स खान

लॉक डाउन के बीच भूखे प्यासे पैदल चलने के लिए विवश एक प्रवासी मज़दूर ने एक रिपोर्टेर से अपना दर्द बयान करते हुए कहा कि अगर आज लालू यादव जेल से बाहर होते तो हमलोगों को इतनी परेशानी नही झेलनी होती। बिहार में खासकर कमज़ोर वर्ग से आने वाले बहुत से लोगों की यह मान्यता है की लालू यादव ऐसे मुश्किल समय में उनके लिए कुछ बेहतर करते। इस बहस से इतर की लालू क्या कर पाते क्या नही, हम यह समझने की कोशिश करेंगे की उनके समर्थक आज भी अगर इस विश्वास के साथ जीते है तो इसकी क्या वजहें हैं।

कुछ लोग इसके लिए कोसी बाढ़ के समय लालू यादव के रोल को याद करते हैं। अगस्त 2008 में कोसी में आये गंभीर बाढ़ ने उत्तर बिहार के करीब आधा दर्जन ज़िलों को अपनी चपेट में ले लिया था। लालू यादव जो उस समय केंद्र की यूपीए सरकार में रेल मंत्री थे, ने त्वरित करवाई करते हुए रेलवे को राहत और बचाव में लगाया और बाढ़ से प्रभावित करीब 4 लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचवाया। चूँकि ट्रैक तक पानी पहुंच चुका था इसलिए कुछ स्थानों पर रेलवे ने खतरा मोल लेते हुए भी लोगों की मदद की। इस ऑपरेशन के लिए यात्रियों या बिहार सरकार से रेलवे ने एक भी पैसा नहीं लिया था।

आइये वर्तमान में लौटते हैं । इस साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। चारा घोटाले के मामले में सज़ा काट रहे लालू यादव जिनका रांची के रिम्स अस्पताल में इलाज चल रहा है पन्द्रह वर्ष पूर्व के अपने तथाकथित ‘जंगल राज’ के लिए हर चुनाव की तरह इस बार भी एनडीए के निशाने पर हैं। हालांकि लालू यादव के शाषन की जो कमियां थीं उसके कारण ही जनता ने उन्हें सत्ता से बेदखल किया होगा, साथ ही लालू जेल में सज़ा काट रहें हैं।

उल्लेखनीय है कि पशु पालन सहित दूसरे विभागों में लालू के सत्ता में आने से दो दशक पहले से ही अवैध निकासी जारी थी इन्ही में से दो मामलों में लालू यादव को दोषी करार दिया गया उन्हेंने इसके खिलाफ ऊपरी न्यायलय में अपील भी किया है। कानूनी पहलुओं की पेचीदगियों की बहस से इतर इतना तो कहा ही जा सकता की लालू से पहले और उनके बाद भी राजनीती में भष्टाचार आम बात है और शायद ही कोई हो जो इस मामले में दूध का धुला हो।

फिर भी भष्टाचार और अपराध को बढ़ावा देने के तमाम आरोपों और दुष्प्रचार के बावजूद लालू यादव में ऐसा क्या है कि उनकी लोकप्रियता घटने के बजाए बढ़ती ही जा रही। साथ ही, राज्य की आबादी का एक बड़ा वर्ग लालू यादव से बहुत ही भाववात्मक जुड़ाव रखता है। क्या सिर्फ जातीय कारणों से ऐसा है, खासकर तब जबकि राजद के वोट बैंक के अतिरिक्त लालू यादव के प्रति नरम रवैया रखने वालों में बड़ी तादाद बुद्धिजीविओं और सिविल राइट एक्टिविस्ट की है।

लालू कैसे बन गए गरीबों के मसीहा’ और ‘सामाजिक न्याय के चैंपियन

आखिर लालू को ‘जन नेता’, ‘गरीबों के मसीहा’ और ‘सामाजिक न्याय के चैंपियन’ के रूप में पहचान का क्या कारण है ? प्रख्यात सोशल एक्टिविस्ट, सत्यनारायण मदन इस पर रौशनी डालते हुए कहते हैं, “1990 के दशक की शुरुआत में लालू यादव की सरकार ने ग्रामीण और शहरी इलाकों में दलितों, अल्पसंख़्यकों और पिछड़ी जातियों की बस्तियों में बड़े पैमाने पर स्कूल और सामुदायिक केंद्रों की स्थापना की। इस एक कदम से कमज़ोर तबकों का सिर्फ शैक्षणिक या सामाजिक सशक्तीकरण ही नही बल्कि राजनीतिक सशक्तीकरण का भी रास्ता खुला।”

वह बताते हैं, “उस समय तक प्राथमिक और मध्य विद्यालय ज़्यादा तर प्रभावशाली जातियों के वर्चस्व वाले मुहल्लों और गांव में हुआ करते थे और इन्हीं स्कूलों और सामुदायिक केंद्रों का उपयोग मतदान केंद्र के रूप में होता था । ऐसे में दलितों और पिछड़ों का वहां जाकर वोट देना टेढ़ी खीर साबित होती थी। लेकिन जब दलित और पिछड़े इलाकों में भी मतदान केन्द्र बनने लगे तो इन कमज़ोर तबकों के लिए अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना आसान हो गया। ”

सत्यनारायण मदन आगे कहते हैं,’ चूंकि ज़्यादातर सरकारी निर्माण कार्य ठेकेदारों की मदद से होते हैं, लालू- राबड़ी राज्य में ऐसे ठेकों में पिछड़े और दलितों को प्राथमिकता मिलने से इन जातियों का आर्थिक विकास भी हुआ। साथ ही पहली बार राबड़ी देवी के कार्यकाल में प्राथमिक शिक्षकों के पद के लिए महिला आरक्षण की घोषणा की गई थी। ”

लालू यादव को शुरुआती दिनों में किन चैलेंजेस से निबटना पड़ा

यह बात सही है कि लालू-राबड़ी का कार्यालय कई मामलों में विफल रहा है। उनके शाषन की शुरूआत मंडल युग के चरम पर हुई थी। वह जाति संबंधी हिंसा पर अंकुश नहीं लगा सके साथ ही राबड़ी देवी के काल में अपराध में बढ़ोतरी हुई। विकास के मामले में उनका प्रदर्शन बहुत उल्लेखनीय नहीं रहा। लेकिन लालू के साथ समस्या यह है कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में उनकी वास्तविक उपलब्धियों भी सामने नही आईं।

वरिष्ठ पत्रकार सोरूर अहमद बताते हैं: “जब लालू सत्ता में आए, तब मंदिर और मंडल आंदोलन अपने चरम पर थे। बिहार नक्सली हिंसा की चपेट में था। उस समय विकास किसी भी पार्टी के लिए कोई मुद्दा नहीं था। देश की अर्थव्यवस्था तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार को मुद्रा के अवमूल्यन, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति अपनाने के लिए मजबूर कर रही थी। मंडल-मंदिर का विभाजन इतना गहरा था कि सरकारी तंत्र में प्रभावशाली जातियों के अधिकांश कर्मचारी नहीं चाहते थे कि लालू कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करें। स्थानीय स्तर पर अधिकारी सरकार के कई फैसलों में जानबूझकर देरी करते थे ताकि सरकार की बदनामी हो। “

सोरूर अहमद लालू के प्रति तात्कालिक पत्रकारिता के रवैये का उल्लेख करते हुए बताते हैं ” लालू-राबड़ी के दौर में ऐसे लगता था सरकार के हर फैसले का विरोध करना ही पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य है। मुझे याद है जब 1995 के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद लालू यादव ने एनआरआई सम्मेलन की पूर्व संध्या पर पटना में सौंदर्यीकरण अभियान चलाया था, तब इस कदम की सराहना करने के बजाय एक पत्रकार ने कहा था कि सड़कें बनाने से कुछ नही होगा उद्योग लाइए। इस प्रकार अधिकांश मीडियाकर्मियों का यह रवैया था  कि आप जो चाहें करें हम आपकी सराहना नहीं करेंगे। साथ ही नीतीश कुमार की एनडीए सरकार को मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली केंद्र सरकार द्वारा जिस उदारता के साथ विभिन्न योजनाओं के लिए राशि उपलब्ध कराई गई, लालू-राबड़ी सरकार को इस तरह का सहयोग कभी नहीं मिला।”

अपनी छवि के प्रति सचेत न होना

लालू यादव, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तरह अपनी छवि को लेकर उस तरह कभी भी सजग नही रहे। मीडिया, खासकर अंग्रेजी अखबारों में अपनी आलोचनाओं की ज़रा भी परवाह नही करते थे। उनकी सोंच थी की प्रभावशाली जाति और उच्च मध्यम वर्ग उनकी जितनी आलोचना करेगा, पिछड़े और दलित समाज में उनके समर्थन में उतना इज़ाफ़ा होगा।

हालांकि उन्होंने सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सौहार्द के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों का हमेशा उल्लेख किया, लेकिन आर्थिक और अन्य मोर्चों पर किये गए कामों को उस तरह हाईलाइट नही किया। उदाहरण के लिए, उन्हें लोगों को यह बताने में दिलचस्पी नहीं थी कि उनकी सरकार ने भागलपुर में गंगा पर एक पुल बनाया या आरा, छपरा, मधेपुरा और हजारीबाग (झारखंड) में चार विश्वविद्यालय स्थापित किए या पटना में तारामंडल का निर्माण कराया।

रेलवे मंत्री रहते हुए उन्होंने करीब 52000 करोड़ की परियोजना बिहार को दिलवाया जिसमें मध्यपुरा और छपरा में रेल इंजन का कारखाना लगवाना शामिल है।

अहमद के अनुसार केन्द्रीय रेल मंत्री (2004-09) के रूप में लालू ने अपनी उपलब्धियों का उल्लेख करना शुरू किया। “या आप यह कह सकते हैं कि मीडिया ने रेल मंत्री के रूप में उनके द्वारा किये गए कामों को अधिक कवरेज दिया क्योंकि इससे मध्यम वर्ग का हित जुड़ा था। यहां यह भी याद दिलाया जाना चाहिए कि उन्हें राज्य की पत्रकारिता की तुलना में राष्ट्रीय मीडिया में अधिक सकारात्मक कवरेज मिला।”

सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सद्भाव के मुद्दे पर समझौता नहीं करने के लालू यादव का अनूठा रिकॉर्ड रहा है । यहां तक ​​कि दूसरे प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं जैसे कि मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक ने कभी न कभी भाजपा के साथ हाथ मिलाया लेकिन लालू अपने सिद्धांतों पर जमे रहे।

बोधगया भूमि आंदोलन से जुड़े कृष्ण मुरारी कहते हैं की नौकरशाह कभी भी लालू को उनके गरीबों के प्रति झुकाव और व्यहवारिकता के लिए पसन्द नही कर सकते। उन्होंने कहा, “लोग अपने काम के लिए सीधे लालू के पास जाते थे क्योंकि मुख्यमंत्री होते हुए भी उनके द्वार गरीब और आमलोगों के लिए हमेशा खुले रहते थे।” हालांकि कुछ मामलों में इससे ऑफिसियल प्रकिया के पालन में बाधा उतपन्न हो जाती थी, साथ ही कुछ स्वार्थी लोग इसका दुरुपयोग भी करते थे लेकिन आमलोगों की मुख्यमंत्री तक पहुंच से बहुत से कमज़ोर और ज़रूरतमंद लोगों को फायदा मिलता रहा जिसकी वर्तमान समय में कल्पना नहीं की जा सकती।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं। इस आलेख के लिए लेखक ने Morning Chronicle में पूर्व में प्रकाशित अपनी एक आर्टिकल से कुछ इनपुट्स लिए हैं।)

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